विषय · 12 श्लोक

भगवद् गीता में Atman

आत्मा वह है जो आप वास्तव में हैं — किसी नाम, शरीर या भूमिका से पहले। जो बदलते को देखती है, स्वयं अपरिवर्तित रहकर। गीता का पहला क़दम और अंतिम क़दम — दोनों इसी की ओर।

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भगवद् गीता 2.12Speaker: Krishna
त्वेवाहं जातु नासं त्वं नेमे जनाधिपाः
चैव भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्
अर्थ · हिन्दी
किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे, यह बात भी नहीं है और इसके बाद भविष्य में मैं, तू और राजलोग हम सभी नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है ॥
सार
Krishna says that he, Arjuna, and the kings have always existed in some form, and none of them will simply vanish after death.
What truly exists was never born and never lost.
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भगवद् गीता 2.13Speaker: Krishna
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र मुह्यति
अर्थ · हिन्दी
देहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है । उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता ॥
सार
The body changes through stages, and the one living in it moves on to another body. A steady person does not get confused by this.
What changes form is not what you truly are.
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भगवद् गीता 2.17Speaker: Krishna
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्
विनाशमव्ययस्यास्य कश्चित् कर्तुमर्हति
अर्थ · हिन्दी
अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है । इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता ॥
सार
Know that the reality behind everything is imperishable. No force can destroy what pervades the whole world.
What truly pervades everything cannot be destroyed.
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