भगवद् गीता में अर्जुन विषाद
अर्जुन विषाद अर्जुन का वह शोक है जो दोनों सेनाओं में अपने स्वजनों को देखकर उठता है; इसी से गीता आरम्भ होती है।
गीता के 14 श्लोक जो अर्जुन विषाद पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
- 1.32अ. 1
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
हे कृष्ण मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य चाहता हूँ और न सुखों को ही चाहता हूँ ।
- 1.33अ. 1
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये सब अपने प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं ॥
- 1.35अ. 1
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना…
- 1.37अ. 1
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
इसलिये अपने बान्धव इन धृतराष्ट्रसम्बन्धियों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं क्योंकि हे माधव अपने कुटुम्बियों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे…
- 1.38अ. 1
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेकविचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये दुर्योधन आदि कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से…
- 1.42अ. 1
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जानेवाला ही होता है ।
- 1.44अ. 1
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
हे जनार्दन जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरकों में वापस होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं ॥
- 1.45अ. 1
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के…
- 1.46अ. 1
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
अगर ये हाथों में शस्त्रअस्त्र लिये हुए धृतराष्ट्र के पक्षपाती लोग युद्धभूमि में सामना न करनेवाले तथा शस्त्ररहित मुझ को मार भी दें, तो वह…
- 2.7अ. 2
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावःपृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
कायरतारूपदोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये…
- 2.8अ. 2
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
पृथ्वीपर धनधान्यसमृद्ध और शत्रुरहितराज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो…