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विषय · 14 श्लोक

भगवद् गीता में अर्जुन विषाद

अर्जुन विषाद अर्जुन का वह शोक है जो दोनों सेनाओं में अपने स्वजनों को देखकर उठता है; इसी से गीता आरम्भ होती है।

गीता के 14 श्लोक जो अर्जुन विषाद पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 1.28
अर्जुन उवाचकृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले हे कृष्ण युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्बसमुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं । हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है । मेरा मन भ्रमितसा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ ॥
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भगवद् गीता 1.29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले हे कृष्ण युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्बसमुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं । हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है । मेरा मन भ्रमितसा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ ॥
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भगवद् गीता 1.31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
हिन्दी अर्थ
हे केशव मैं लक्षणों शकुनों को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय लाभ भी नहीं देख रहा हूँ ॥
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