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विषय · 10 श्लोक

भगवद् गीता में अहंकार

अहंकार 'मैं कर्ता हूँ' का भाव है; गीता कहती है कि सब कर्म गुण करते हैं, पर अहंकार से मोहित व्यक्ति स्वयं को कर्ता मानता है।

अहंकार वह 'मैं-निर्माता' है — जिससे असीम आत्मा एक सीमित, नामधारी व्यक्ति होने की भूल करती है। गीता अहंकार की निंदा नहीं करती — वह उसे मूल भ्रांति के रूप में पहचानती है और उससे परे इशारा करती है।

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भगवद् गीता 3.28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
हिन्दी अर्थ
हे महाबाहो गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता ॥
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भगवद् गीता 12.13
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
हिन्दी अर्थ
सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र प्रेमी और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है ॥
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भगवद् गीता 13.6
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
हिन्दी अर्थ
मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि महत्तत्त्व, समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय यह चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र है ॥
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आगे पढ़ें · अहंकार की कड़ी
गीता 2.62-63: कामना, क्रोध और बुद्धिनाश की शृंखला
अहंकार अकेला नहीं टूटता। कृष्ण दो श्लोकों में वह पूरी शृंखला बताते हैं जो विषय-चिंतन से शुरू होकर बुद्धि के नाश पर समाप्त होती है।
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