विषय · 13 श्लोक

भगवद् गीता में Sharanagati

भगवद् गीता के 13 श्लोक जो sharanagati पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.7Speaker: Arjuna
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावःपृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः
यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मेशिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्
अर्थ · हिन्दी
कायरतारूपदोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये । मैं आपका शिष्य हूँ । आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये ॥
सार
Arjuna admits he is overwhelmed and confused about what is truly right. He asks Krishna to clearly tell him the best course, as a student seeking guidance.
Clarity begins when you admit you cannot see the right action alone.
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भगवद् गीता 7.14Speaker: Krishna
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते
अर्थ · हिन्दी
क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है । जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं ॥
सार
The forces that shape ordinary life are hard to overcome on your own. Surrendering to Krishna is what carries a person beyond them.
The way beyond the veil is not force, but refuge.
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भगवद् गीता 9.31Speaker: Krishna
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति
कौन्तेय प्रतिजानीहि मे भक्तः प्रणश्यति
अर्थ · हिन्दी
वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है । हे कुन्तीनन्दन तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश पतन नहीं होता ॥
सार
A devoted person quickly becomes upright and finds lasting peace. Krishna says his devotee will not come to ruin.
Devotion quickly changes a person and protects them from ruin.
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