भगवद् गीता में शरणागति
शरणागति ईश्वर की शरण लेना है; 18.66 में कृष्ण कहते हैं कि सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ।
गीता के 13 श्लोक जो शरणागति पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मेशिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
- 9.32अ. 9
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
हे पृथानन्दन जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते…
- 11.4अ. 11
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
हे प्रभो मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा…
- 11.33अ. 11
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्वजित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो ।
- 18.56अ. 18
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है ॥
- 18.57अ. 18
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा ॥
- 18.58अ. 18
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा ॥
- 18.62अ. 18
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा ।
- 18.63अ. 18
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तुझे कह दिया । अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर ॥
- 18.64अ. 18
सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः ।
सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन । तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा ॥
- 18.66अ. 18
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर ॥