अन्य भाषाRead in English
विषय · 13 श्लोक

भगवद् गीता में शरणागति

शरणागति ईश्वर की शरण लेना है; 18.66 में कृष्ण कहते हैं कि सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ।

गीता के 13 श्लोक जो शरणागति पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.7
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावःपृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मेशिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
हिन्दी अर्थ
कायरतारूपदोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये । मैं आपका शिष्य हूँ । आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 7.14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
हिन्दी अर्थ
क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है । जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 9.31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
हिन्दी अर्थ
वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है । हे कुन्तीनन्दन तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश पतन नहीं होता ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
सभी 13 श्लोक