विषय · 13 श्लोक
भगवद् गीता में Sharanagati
भगवद् गीता के 13 श्लोक जो sharanagati पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 2.7कायरतारूपदोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कह
- 7.14क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है । जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते है
- 9.31वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है । हे कुन्तीनन्दन तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका
- 9.32हे पृथानन्दन जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते ह
- 11.4हे प्रभो मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा दीज
- 11.33इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो । ये सभी मेरे द्वारा पहलेसे ही म
- 18.56मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है ॥
- 18.57चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा ॥
- 18.58मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा ॥
- 18.62हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा । उसकी कृपासे तू परमशान्तिसंसारसे सर्वथा उपरति को और अविनाशी परमपदको प्राप्
- 18.63यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तुझे कह दिया । अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर ॥
- 18.64सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन । तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा ॥
- 18.66सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर ॥