भगवद् गीता में संन्यास
संन्यास का अर्थ है त्याग; 6.1 में कृष्ण कहते हैं कि संन्यासी वह है जो फल का आश्रय लिए बिना कर्तव्य कर्म करता है।
गीता के 12 श्लोक जो संन्यास पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥
- 6.1अ. 6
श्री भगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
श्रीभगवान् बोले कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता…
- 6.2अ. 6
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
हे अर्जुन लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोईसा भी योगी नहीं हो सकता ॥
- 18.1अ. 18
अर्जुन उवाचसंन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
अर्जुन बोले हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ ॥
- 18.2अ. 18
श्री भगवानुवाचकाम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
॥
- 18.3अ. 18
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
श्रीभगवान् बोले कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं ।
- 18.4अ. 18
निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू संन्यास और त्याग इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ त्याग तीन…
- 18.11अ. 18
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है । इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है ऐसा कहा जाता है ॥
- 18.12अ. 18
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु कर्मफलका त्याग…
- 18.49अ. 18
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त…