भगवद् गीता में निष्काम कर्म
निष्काम कर्म फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म है; 2.47 कहता है: तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर कभी नहीं।
गीता के 12 श्लोक जो निष्काम कर्म पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
न चास्य सर्वभूतेषु कश्िचदर्थव्यपाश्रयः ॥
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
- 3.20अ. 3
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
राजा जनकजैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं ।
- 3.30अ. 3
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संतापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मको कर ॥
- 4.20अ. 4
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ॥
- 4.23अ. 4
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके…
- 5.10अ. 5
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
जो भक्तियोगी सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता ॥
- 6.1अ. 6
श्री भगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
श्रीभगवान् बोले कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता…
- 8.7अ. 8
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा ॥
- 18.6अ. 18
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम…
- 18.23अ. 18
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक…