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विषय · 12 श्लोक

भगवद् गीता में निष्काम कर्म

निष्काम कर्म फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म है; 2.47 कहता है: तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर कभी नहीं।

गीता के 12 श्लोक जो निष्काम कर्म पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.51
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
हिन्दी अर्थ
समतायुक्त मनीषी साधक कर्मजन्य फलका त्याग करके जन्मरूप बन्धनसे मुक्त होकर निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं ॥
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भगवद् गीता 3.18
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्िचदर्थव्यपाश्रयः ॥
हिन्दी अर्थ
उस कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषका इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है, और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें किसी भी प्राणीके साथ इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता ॥
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भगवद् गीता 3.19
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्मका भलीभाँति आचरण कर क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥
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