भगवद् गीता में कर्मसंन्यास
कर्मसंन्यास कर्म का त्याग है; 5.2 में कृष्ण कहते हैं कि संन्यास और कर्मयोग दोनों कल्याण देते हैं, पर कर्मयोग श्रेष्ठ है।
गीता के 11 श्लोक जो कर्मसंन्यास पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
- 5.8अ. 5
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें…
- 5.9अ. 5
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता हुआ, श्वास लेता तथा…
- 5.13अ. 5
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह…
- 5.17अ. 5
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर…
- 5.19अ. 5
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवितअवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही…
- 5.25अ. 5
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
जिनका शरीर मनबुद्धिइन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष…
- 12.6अ. 12
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
परन्तु जो कर्मोंको मेरे अर्पण करके और मेरे परायण होकर अनन्ययोगसे मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं ॥
- 18.57अ. 18
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा ॥