भगवद् गीता में Indriya Nigraha
भगवद् गीता के 14 श्लोक जो indriya nigraha पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
- 2.68अ. 2
Steady wisdom begins when the senses stop ruling your attention.
इसलिये हे महाबाहो जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत वशमें की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है ॥
- 3.6अ. 3
Outer restraint means nothing if the mind still feeds desire.
जो कर्मेन्द्रियों सम्पूर्ण इन्द्रियों को हठपूर्वक रोककर मनसे इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धिवा
- 3.7अ. 3
Self-mastery makes action noble, not the outer task alone.
हे अर्जुन जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर निष्काम भावसे समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आ
- 3.41अ. 3
Sense-control comes before clear action.
इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पा
- 4.27अ. 4
Knowledge turns self-control into a fire that consumes every impulse.
अन्य योगीलोग सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी क्रियाओंको और प्राणोंकी क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्निमें हवन किया
- 4.39अ. 4
Trust, discipline, and restraint make room for peace.
जो जितेन्द्रिय तथा साधनपरायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शा
- 5.28अ. 5
Freedom begins where desire, fear, and anger lose authority.
बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान
- 6.12अ. 6
Meditation begins by gathering the mind and training the senses.
उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास कर
- 12.4अ. 12
Reach the divine by mastering yourself and caring for everyone.
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करत
- 12.5अ. 12
The subtlest path is hardest for a body-bound mind.
अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको अपने साधनमें कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठ
- 18.51अ. 18
Purified resolve cuts the pull of craving and aversion.
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक