भगवद् गीता में धर्म
धर्म वह कर्तव्य है जो अपने स्वभाव और भूमिका के अनुसार उचित है; कृष्ण कहते हैं कि अपना धर्म दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है।
धर्म वह है जो संसार को धारण करता है — आपकी भूमिका, आपका कर्तव्य, आपका मार्ग। गीता अर्जुन को धर्म थमाती नहीं — उसे पहचानने में मदद करती है।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
- 3.10अ. 3
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजामनुष्य आदि की रचना करके उनसे प्रधानतया मनुष्योंसे कहा कि तुमलोग इस…
- 3.11अ. 3
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजामनुष्य आदि की रचना करके उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे कहा कि तुमलोग इस…
- 3.16अ. 3
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
हे पार्थ जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु…
- 4.7अ. 4
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
हे भरतवंशी अर्जुन जबजब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तबतब ही मैं अपनेआपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ ॥
- 9.2अ. 9
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
यह सम्पूर्ण विद्याओंका और सम्पूर्ण गोपनीयोंका राजा है । यह अति पवित्र तथा अतिश्रेष्ठ है और इसका फल भी प्रत्यक्ष है ।
- 16.9अ. 16
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
उपर्युक्त नास्तिक दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु…
- 16.24अ. 16
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
अतः तेरे लिये कर्तव्यअकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्रविधिसे नियत कर्तव्य कर्म करनेयोग्य है ॥
- 18.7अ. 18
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है । उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है ॥
- 18.41अ. 18
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
हे परंतप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं ॥
- 18.44अ. 18
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना ये सबकेसब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक…
- 18.45अ. 18
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
अपनेअपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धिपरमात्माको प्राप्त कर लेता है ।