विषय · 14 श्लोक

भगवद् गीता में Dharma

धर्म वह है जो संसार को धारण करता है — आपकी भूमिका, आपका कर्तव्य, आपका मार्ग। गीता अर्जुन को धर्म थमाती नहीं — उसे पहचानने में मदद करती है।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.18Speaker: Krishna
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत
अर्थ · हिन्दी
अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं । इसलिये हे अर्जुन तुम युद्ध करो ॥
सार
Bodies are temporary, but the inner being is eternal and cannot be measured or destroyed. Arjuna is told to fight because of that truth.
What is truly you cannot be destroyed, so duty remains.
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भगवद् गीता 2.34Speaker: Krishna
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते
अर्थ · हिन्दी
और सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्तिका कथन अर्थात निंदा करेंगे । वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है ॥
सार
People will keep speaking of your disgrace, and for someone who has been honored, that shame feels worse than death.
A honored life can be wounded more by shame than by death.
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भगवद् गीता 2.40Speaker: Krishna
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो विद्यते
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्
अर्थ · हिन्दी
मनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान जन्ममरणरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है ॥
सार
Even a small beginning in this discipline is never wasted, never backfires, and can protect you from deep fear.
Even a tiny start on the right path protects you from fear.
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