अन्य भाषाRead in English
विषय · 12 श्लोक

भगवद् गीता में अक्षर

अक्षर का अर्थ है जिसका नाश न हो; गीता इसे अविनाशी सत्य के लिए, और अध्याय 15 में अक्षर पुरुष के लिए प्रयोग करती है।

गीता के 12 श्लोक जो अक्षर पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 3.15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं । अन्न वर्षासे होती है । वर्षा यज्ञसे होती है । यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है । कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान । इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ कर्तव्यकर्म में नित्य प्रतिष्ठित है ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 8.3
श्री भगवानुवाचअक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोले परम अक्षर ब्रह्म है और जीवका अपना जो होनापन है, उसको अध्यात्म कहते हैं । प्राणियों का उद्भव सत्ता को प्रकट करनेवाला जो त्याग है उसको कर्म कहा जाता है ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 8.11
यदक्षरं वेदविदो वदन्तिविशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्तितत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
हिन्दी अर्थ
वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
सभी 12 श्लोक