भगवद् गीता में अक्षर
अक्षर का अर्थ है जिसका नाश न हो; गीता इसे अविनाशी सत्य के लिए, और अध्याय 15 में अक्षर पुरुष के लिए प्रयोग करती है।
गीता के 12 श्लोक जो अक्षर पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्तितत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
- 8.16अ. 8
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
हे अर्जुन ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती है परन्तु हे कौन्तेय मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता ॥
- 8.20अ. 8
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
परन्तु उस अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं…
- 8.21अ. 8
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है ॥
- 8.24अ. 8
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
जिस मार्गमें प्रकाशस्वरूप अग्निका अधिपति देवता, दिनका अधिपति देवता, शुक्लपक्षका अधिपति देवता, और छः महीनोंवाले उत्तरायणका अधिपति देवता है,…
- 11.18अ. 11
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर अक्षरब्रह्म हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन…
- 12.1अ. 12
अर्जुन उवाचएवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आपसगुण भगवान् की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम…
- 12.3अ. 12
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे…
- 15.16अ. 15
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
इस संसारमें क्षर नाशवान् और अक्षर अविनाशी ये दो प्रकारके पुरुष हैं ।
- 15.18अ. 15
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥