भगवद् गीता में कर्मफल
कर्मफल कर्म का परिणाम है; गीता सिखाती है कि फल को कर्म का कारण मत बनाओ (2.47)।
गीता के 10 श्लोक जो कर्मफल पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥
- 4.23अ. 4
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके…
- 5.14अ. 5
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है ॥
- 5.15अ. 5
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं ॥
- 6.1अ. 6
श्री भगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
श्रीभगवान् बोले कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता…
- 14.15अ. 14
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है ॥
- 14.16अ. 14
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
विवेकी पुरुषोंने शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान मूढ़ता कहा है ॥
- 18.12अ. 18
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु कर्मफलका त्याग…