भगवद् गीता में अनुशासन
गीता अनुशासन को भोजन, नींद और कर्म में संयम तथा नियमित अभ्यास से जोड़ती है; इसी से योग सधता है।
गीता के 14 श्लोक जो अनुशासन पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥
- 4.28अ. 4
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं, और दूसरे कितने ही…
- 5.6अ. 5
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
परन्तु हे महाबाहो कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥
- 6.5अ. 6
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ॥
- 6.16अ. 6
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
हे अर्जुन यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है ॥
- 6.17अ. 6
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही…
- 6.46अ. 6
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
सकामभाववाले तपस्वियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है और कर्मियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है ऐसा मेरा मत है ।
- 16.23अ. 16
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिअन्तःकरणकी शुद्धि को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है ॥
- 17.5अ. 17
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं जो भोगपदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं जो शरीरमें…
- 17.6अ. 17
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं जो भोगपदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं जो शरीरमें…
- 17.19अ. 17
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे अपनेको पीड़ा देकर अथवा दूसरोंको कष्ट देनेके लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है ॥
- 18.34अ. 18
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
हे पृथानन्दन अर्जुन फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम भोग और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है ॥