विषय · 14 श्लोक
भगवद् गीता में Arjuna Prayer
भगवद् गीता के 14 श्लोक जो arjuna prayer पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 10.12अर्जुन बोले परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं । आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु व्यापक हैं ऐसा सबकेसब ऋषि, देव
- 10.14हे केशव मेरेसे आप जो कुछ कह रहे हैं, यह सब मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन् आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं ॥
- 10.16जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं ॥
- 10.17हे योगिन् हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और हे भगवन् किनकिन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात्
- 11.2हे कमलनयन सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलय मैंने विस्तारपूर्वक आपसे ही सुना है और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है ॥
- 11.17मैं आपको किरीट, गदा, चक्र तथा शङ्ख और पद्म धारण किये हुए देख रहा हूँ । आपको तेजकी राशि, सब ओर प्रकाश करनेवाले, देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्यके
- 11.36अर्जुन बोले हे अन्तर्यामी भगवन् आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुरागप्रेम को प्राप्त हो रहा है
- 11.37हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये वे सिद्धगण नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास
- 11.39आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह ब्रह्माजीके भी पिता हैं । आपको हजारों बार नमस्कार हो नमस्कार हो
- 11.41आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प
- 11.42आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे भी हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इ
- 11.43आप ही इस चराचर संसारके पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं और आप ही गुरुओंके महान् गुरु हैं । हे अनन्त प्रभावशाली भगवन् इस त्रिलोकीमें आपके समान भी
- 11.44इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ । जैसे पिता पुत्रके, मित्र मित्रके और पति पत्न
- 11.45मैंने ऐसा रुप पहले कभी नहीं देखा । इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथहीसाथ भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है । अतः आप मुझे अप