विषय · 14 श्लोक

भगवद् गीता में Arjuna Prayer

भगवद् गीता के 14 श्लोक जो arjuna prayer पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 10.12Speaker: Arjuna
अर्जुन उवाचपरं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्
अर्थ · हिन्दी
अर्जुन बोले परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं । आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु व्यापक हैं ऐसा सबकेसब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं ॥
सार
Arjuna recognises Krishna as the highest reality, the purest refuge, eternal, unborn, and present everywhere.
Recognition turns into surrender when the highest reality stands revealed.
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भगवद् गीता 10.14Speaker: Arjuna
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव
हि ते भगवन् व्यक्ितं विदुर्देवा दानवाः
अर्थ · हिन्दी
हे केशव मेरेसे आप जो कुछ कह रहे हैं, यह सब मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन् आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं ॥
सार
Arjuna accepts Krishna's words as true and says that even radiant beings and shadow beings do not understand Krishna's revealed form.
True recognition begins where ordinary beings cannot see.
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भगवद् गीता 10.16Speaker: Arjuna
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि
अर्थ · हिन्दी
जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं ॥
सार
Arjuna says only Krishna can fully explain his own divine manifestations, because Krishna pervades and supports all the worlds through them.
Only the source can fully name its own presence in the world.
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