भगवद् गीता में अर्जुन की स्तुति
ये अर्जुन की प्रार्थनाएँ और स्तुतियाँ हैं, अधिकतर अध्याय 10 और 11 में, जब वे कृष्ण का स्वरूप पहचानते हैं।
गीता के 14 श्लोक जो अर्जुन की स्तुति पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
न हि ते भगवन् व्यक्ितं विदुर्देवा न दानवाः ॥
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥
- 10.17अ. 10
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
हे योगिन् हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और हे भगवन् किनकिन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात्…
- 11.2अ. 11
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
हे कमलनयन सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलय मैंने विस्तारपूर्वक आपसे ही सुना है और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है ॥
- 11.17अ. 11
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं चतेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम् ।
मैं आपको किरीट, गदा, चक्र तथा शङ्ख और पद्म धारण किये हुए देख रहा हूँ ।
- 11.36अ. 11
अर्जुन उवाचस्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्याजगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
अर्जुन बोले हे अन्तर्यामी भगवन् आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुरागप्रेम को प्राप्त हो रहा है ।
- 11.37अ. 11
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये वे सिद्धगण नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास…
- 11.39अ. 11
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कःप्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह ब्रह्माजीके भी पिता हैं ।
- 11.41अ. 11
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तंहे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस…
- 11.42अ. 11
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसिविहारशय्यासनभोजनेषु ।
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे भी हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस…
- 11.43अ. 11
पितासि लोकस्य चराचरस्यत्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
आप ही इस चराचर संसारके पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं और आप ही गुरुओंके महान् गुरु हैं ।
- 11.44अ. 11
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ ।
- 11.45अ. 11
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वाभयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
मैंने ऐसा रुप पहले कभी नहीं देखा । इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथहीसाथ भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है ।