तैत्तिरीय उपनिषद 1.11.2
मातृदेवो भव, पितृदेवो भव: माता पिता को देवता मानो
मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव ।
mātṛdevo bhava | pitṛdevo bhava | ācāryadevo bhava | atithidevo bhava |
माता को देवता मानो। पिता को देवता मानो। गुरु को देवता मानो। अतिथि को देवता मानो।
मातृदेवो भव ("माता को देवता मानो") तैत्तिरीय उपनिषद 1.11.2 का वाक्य है, जो कृष्ण यजुर्वेद का उपनिषद है। गुरु यह बात उन शिष्यों से कहते हैं जो पढ़ाई पूरी करके घर लौट रहे हैं। साथ में पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव और अतिथिदेवो भव: पिता, गुरु और अतिथि को भी देवता मानो।
पूरा अंश
देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकंसुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ॥
devapitṛkāryābhyāṃ na pramaditavyam | mātṛdevo bhava | pitṛdevo bhava | ācāryadevo bhava | atithidevo bhava | yānyanavadyāni karmāṇi | tāni sevitavyāni | no itarāṇi | yānyasmākaṃsucaritāni | tāni tvayopāsyāni ||
देवताओं और पितरों के प्रति अपने कर्तव्य में ढील मत देना। माता को देवता मानो। पिता को देवता मानो। गुरु को देवता मानो। अतिथि को देवता मानो। जो कर्म निर्दोष हैं, वही करो, दूसरे नहीं। हमारे जो अच्छे आचरण हैं, उन्हीं को अपनाओ, बाकी को नहीं।
किसने, किससे कहा
यह गुरु का विदाई उपदेश है, शिक्षा वल्ली का ग्यारहवाँ अनुवाक। यह "सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्याय में ढील मत दो" (1.11.1) से शुरू होता है और फिर बताता है कि पढ़ाई पूरी करके निकला शिष्य किन लोगों का आदर करे। अंत में सीधी सलाह है: हमारा सिर्फ़ अच्छा आचरण अपनाओ, श्रद्धा और विनय से दान दो, और जब कोई शंका हो तो वैसा करो जैसा आसपास के समझदार और दयालु लोग करते हैं।
आचार्य इसे कैसे पढ़ते हैं
शंकराचार्य
शंकराचार्य कहते हैं कि माता, पिता, गुरु और अतिथि का आदर वैसे ही करो जैसे देवता का करते हो। वे जोड़ते हैं कि यह उपदेश कर्म करने वाले गृहस्थ के लिए है। इससे मन साफ़ होता है और आगे की वल्लियों के ज्ञान के लिए तैयार होता है।
दूसरी बात
इसे कोई आचार्य अलग ढंग से नहीं पढ़ता। अतिथिदेवो भव भारत के पर्यटन विभाग का नारा भी है।
लिखने का सही रूप
- मातृदेवो भवmātṛdevo bhava
- मातृदेवो भव । पितृदेवो भव ।mātṛdevo bhava | pitṛdevo bhava |
- अतिथिदेवो भवatithidevo bhava
- మాతృదేవో భవ । పితృదేవో భవ ।mātṛdevo bhava | pitṛdevo bhava |
- ಮಾತೃದೇವೋ ಭವ । ಪಿತೃದೇವೋ ಭವ ।mātṛdevo bhava | pitṛdevo bhava |
एक समास और एक क्रिया: मातृ + देवः मिलकर भव से पहले मातृदेवो बनता है, और भव का अर्थ है "हो जाओ"। आम तौर पर इसे अलग अलग शब्दों में "मातृ देवो भव" भी लिखा जाता है।
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गीता में यही बात
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शुरू करेंआगे पढ़ें
- सत्यमेव जयते: जीत सत्य की ही होती हैसत्यमेव जयते नानृतंMundaka Upanishad 3.1.6
- असतो मा सद्गमय: असत्य से सत्य की ओरअसतो मा सद्गमयBrihadaranyaka Upanishad 1.3.28
- English: Matru devo bhava, pitru devo bhava: let your mother and father be gods to youTaittiriya Upanishad 1.11.2
- Who am I: 7 श्लोकों का प्लान (अंग्रेज़ी)सात उपनिषदों से सात श्लोक, रोज़ एक।
- उपनिषद क्या हैंकितने हैं, कौन से मुख्य हैं, कहाँ से शुरू करें।
लोग अक्सर पूछते हैं
मातृ देवो भव किस उपनिषद से है?
मातृ देवो भव पितृ देवो भव का अर्थ क्या है?
पूरा श्लोक क्या है?
स्रोत और तरीका
संस्कृत पाठ Wisdom के संग्रह से है, जिसे sanskritdocuments.org के संस्करण से मिलाया गया है। हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ Wisdom का अपना है, शंकराचार्य के भाष्य के आधार पर। अभी इसकी मानवीय समीक्षा चल रही है।