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विषय · 18 श्लोक

भगवद् गीता में तमस्

तमस् अंधकार और जड़ता का गुण है; गीता के अनुसार यह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है।

गीता के 18 श्लोक जो तमस् पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 8.9
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
हिन्दी अर्थ
जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्मसेसूक्ष्म, सबका धारणपोषण करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाशस्वरूप ऐसे अचिन्त्य स्वरूपका चिन्तन करता है ॥
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भगवद् गीता 13.18
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥
हिन्दी अर्थ
वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियोंका भी ज्योति और अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है । वह ज्ञानस्वरूप, जाननेयोग्य, ज्ञानसाधनसमुदाय से प्राप्त करनेयोग्य और सबके हृदयमें विराजमान है ॥
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भगवद् गीता 14.8
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
हिन्दी अर्थ
हे भरतवंशी अर्जुन सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको तुम अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला समझो । वह प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा देहधारियोंको बाँधता है ॥
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