भगवद् गीता में तमस्
तमस् अंधकार और जड़ता का गुण है; गीता के अनुसार यह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है।
गीता के 18 श्लोक जो तमस् पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
- 14.9अ. 14
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें भी लगाकर…
- 14.10अ. 14
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण…
- 14.13अ. 14
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
हे कुरुनन्दन तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं ॥
- 14.15अ. 14
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है ॥
- 14.16अ. 14
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
विवेकी पुरुषोंने शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान मूढ़ता कहा है ॥
- 14.17अ. 14
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है ॥
- 14.18अ. 14
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित…
- 17.2अ. 17
श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
श्रीभगवान् बोले मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो ॥
- 17.4अ. 17
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
सात्त्विक मनुष्य देवताओंका पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका और दूसरे जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेतों और भूतगणोंका पूजन करते…
- 17.7अ. 17
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी तीन प्रकारकी…
- 17.10अ. 17
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है ॥
- 17.13अ. 17
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
शास्त्रविधिसे हीन, अन्नदानसे रहित, बिना मन्त्रोंके, बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैं ॥
- 18.22अ. 18
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
किंतु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है ॥
- 18.28अ. 18
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठअकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.38अ. 18
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है ॥