भगवद् गीता में पुरुषोत्तम
पुरुषोत्तम का अर्थ है उत्तम पुरुष; 15.18 में कृष्ण कहते हैं कि वे क्षर से परे और अक्षर से भी उत्तम हैं।
गीता के 14 श्लोक जो पुरुषोत्तम पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
- 15.1अ. 15
श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
श्रीभगवान् बोले ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको…
- 15.4अ. 15
ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
उसके बाद उस परमपदपरमात्मा की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह…
- 15.5अ. 15
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्यनिरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं, जो अपनी…
- 15.6अ. 15
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
उसपरमपद को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते, वही मेरा परमधाम है ॥
- 15.7अ. 15
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है अपना मान लेता है ॥
- 15.10अ. 15
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते,…
- 15.11अ. 15
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यत्न करनेवाले योगीलोग अपनेआपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं ।
- 15.17अ. 15
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरणपोषण करता है ॥
- 15.18अ. 15
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥
- 15.19अ. 15
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
हे भरतवंशी अर्जुन इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है ॥
- 15.20अ. 15
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।
हे निष्पाप अर्जुन इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है ।