भगवद् गीता में Purushottama
भगवद् गीता के 14 श्लोक जो purushottama पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
- 15.1अ. 15
Understanding the world-tree is the beginning of true understanding.
श्रीभगवान् बोले ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते ह
- 15.4अ. 15
The final refuge is a state where return itself stops.
उसके बाद उस परमपदपरमात्मा की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे
- 15.5अ. 15
Freedom begins when pride, craving, and inner division fall away.
जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्यनिरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए
- 15.6अ. 15
The highest home is beyond every ordinary light and beyond return.
उसपरमपद को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते, वही मे
- 15.7अ. 15
What is eternal gets pulled around by what changes.
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है
- 15.10अ. 15
What changes is seen by the wise; the true self is not what moves.
शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष
- 15.11अ. 15
Seeing the supreme reality depends on inner purification, not effort alone.
यत्न करनेवाले योगीलोग अपनेआपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं । परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किय
- 15.17अ. 15
Even the imperishable witness is not the final reality.
उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरणपोषण क
- 15.18अ. 15
The highest reality lies beyond both change and permanence.
मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥
- 15.19अ. 15
Clear seeing of the Supreme Self becomes total devotion.
हे भरतवंशी अर्जुन इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है ॥
- 15.20अ. 15
Secret knowledge makes a person complete.
हे निष्पाप अर्जुन इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है । हे भरतवंशी अर्जुन इसको जानकर मनुष्य ज्