विषय · 11 श्लोक
भगवद् गीता में Krishna Teaching
भगवद् गीता के 11 श्लोक जो krishna teaching पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 2.20यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है । यह जन्मरहित, नित्यनिरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण अनादि
- 2.22मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है ॥
- 2.30हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है । इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नह
- 3.31जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस पूर्वश्लोकमें वर्णित मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते है
- 7.2तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा ॥
- 10.19श्रीभगवान् बोले हाँ, ठीक है । मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे संक्षेपसे कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ मेरी विभूतियोंके वि
- 10.40हे परंतप अर्जुन मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है । मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है, यह तो केवल संक्षेपसे कहा है
- 12.5अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको अपने साधनमें कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जा
- 14.1श्रीभगवान् बोले सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सबकेसब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्
- 18.6हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा निश्चित किया हुआ उत
- 18.13हे महाबाहो कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरेसे समझ ॥