भगवद् गीता में कृष्ण का उपदेश
ये श्लोक कृष्ण के उपदेश के मुख्य कथन हैं, अध्याय 2 की अविनाशी आत्मा से लेकर अध्याय 18 में आसक्ति के त्याग तक।
गीता के 11 श्लोक जो कृष्ण का उपदेश पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
- 3.31अ. 3
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस पूर्वश्लोकमें वर्णित मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते…
- 7.2अ. 7
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा ॥
- 10.19अ. 10
श्री भगवानुवाचहन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
श्रीभगवान् बोले हाँ, ठीक है । मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे संक्षेपसे कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ मेरी विभूतियोंके…
- 10.40अ. 10
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।
हे परंतप अर्जुन मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है । मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है, यह तो केवल संक्षेपसे कहा है ॥
- 12.5अ. 12
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको अपने साधनमें कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठिनतासे प्राप्त की…
- 14.1अ. 14
श्री भगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
श्रीभगवान् बोले सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सबकेसब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको…
- 18.6अ. 18
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम…
- 18.13अ. 18
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
हे महाबाहो कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरेसे समझ ॥