भगवद् गीता में Krishna Teaching
भगवद् गीता के 11 श्लोक जो krishna teaching पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
- 3.31अ. 3
Trusting the teaching frees action from its binding force.
जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस पूर्वश्लोकमें वर्णित मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्ध
- 7.2अ. 7
Real knowing leaves no unfinished hunger for more.
तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा ॥
- 10.19अ. 10
The divine can be named briefly, never exhausted.
श्रीभगवान् बोले हाँ, ठीक है । मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे संक्षेपसे कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ
- 10.40अ. 10
No list can contain the divine's endless expressions.
हे परंतप अर्जुन मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है । मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है, यह तो क
- 12.5अ. 12
The subtlest path is hardest for a body-bound mind.
अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको अपने साधनमें कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठ
- 14.1अ. 14
Some knowledge does not inform you; it completes you.
श्रीभगवान् बोले सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सबकेसब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होक
- 18.6अ. 18
Right action is complete only when desire for reward is dropped.
हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा
- 18.13अ. 18
Action has many causes; the ego is not the whole story.
हे महाबाहो कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको त