भगवद् गीता में कर्म
कर्म का अर्थ है क्रिया; गीता कहती है कि कोई भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, और कर्म आसक्ति से किया जाए तभी बाँधता है।
जो आप करते हैं, वही आप बनते हैं। कर्म गीता का केंद्रीय प्रश्न है — क्या कर्म बंधन है या मुक्ति? ये वे श्लोक हैं जहाँ कृष्ण इसका उत्तर देते हैं।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
- 6.46अ. 6
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
सकामभाववाले तपस्वियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है और कर्मियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है ऐसा मेरा मत है ।
- 7.29अ. 7
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
जरा वृद्धावस्था और मरण मृत्यु से मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण…
- 16.19अ. 16
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
उन द्वेष करनेवाले, क्रूर स्वभाववाले और संसारमें महान् नीच, अपवित्र मनुष्योंको मैं बारबार आसुरी योनियोंमें गिराता ही रहता हूँ ॥
- 18.8अ. 18
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता ॥
- 18.13अ. 18
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
हे महाबाहो कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरेसे समझ ॥
- 18.14अ. 18
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
इसमें कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलगअलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव संस्कार है ॥
- 18.15अ. 18
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये पूर्वोक्त पाँचों हेतु होते हैं ॥
- 18.19अ. 18
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
गुणसंख्यान गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीनतीन…