भगवद् गीता में Grief
भगवद् गीता के 10 श्लोक जो grief पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
- 2.10अ. 2
Guidance begins when grief is met without rejection.
हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश यह आगे क
- 2.11अ. 2
Clear seeing ends grief where the wise know none is needed.
श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके
- 2.25अ. 2
What is deepest in you was never available for loss.
यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है । अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं क
- 2.26अ. 2
Even the plain fact of change is no reason to drown in sorrow.
हे महाबाहो अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाह
- 2.27अ. 2
What must change is not a reason for grief.
क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा । इस जन्ममरणरूप परिवर्तन के प्रवाह का परिहार अर्थात् नि
- 2.30अ. 2
What is most real in a person cannot be killed, so grief loses its ground.
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है । इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके
- 18.35अ. 18
Clinging to fear and sorrow is not strength; it is tamasic inertia.
हे पार्थ दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है