भगवद् गीता में कर्तव्य
गीता सिखाती है कि जो काम तुम्हारा है उसे फल की आसक्ति के बिना करो; कर्म छोड़ देना कोई रास्ता नहीं।
गीता के 13 श्लोक जो कर्तव्य पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥
- 3.9अ. 3
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
यज्ञ कर्तव्यपालन के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र अपने लिये किये जानेवाले कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये…
- 3.19अ. 3
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्मका भलीभाँति आचरण कर क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है…
- 3.20अ. 3
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
राजा जनकजैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं ।
- 3.22अ. 3
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
हे पार्थ मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्तव्यकर्ममें ही लगा रहता हूँ ॥
- 3.23अ. 3
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं ।
- 3.24अ. 3
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं ।
- 3.35अ. 3
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है ।
- 18.23अ. 18
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक…
- 18.31अ. 18
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
हे पार्थ मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ॥
- 18.59अ. 18
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या झूठा है क्योंकि तेरी क्षात्रप्रकृति तेरेको…