भगवद् गीता में स्पष्टता
गीता स्पष्टता को आत्मा की नित्यता जानने और उस सात्त्विक बुद्धि से जोड़ती है जो जानती है कि क्या करना है और क्या नहीं।
गीता के 10 श्लोक जो स्पष्टता पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥
- 2.26अ. 2
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
हे महाबाहो अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये ॥
- 2.49अ. 2
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धियोगसमता की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे अत्यन्त ही निकृष्ट है ।
- 5.16अ. 5
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञानविवक के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता…
- 14.14अ. 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है ॥
- 17.8अ. 17
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ानेवाले, स्थिर रहनेवाले, हृदयको शक्ति देनेवाले, रसयुक्त तथा चिकने ऐसे आहार अर्थात् भोजन…
- 18.16अ. 18
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस कर्मोंके विषयमें केवल शुद्ध आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता क्योंकि उसकी बुद्धि…
- 18.31अ. 18
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
हे पार्थ मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ॥