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विषय · 12 श्लोक

भगवद् गीता में अक्षर ब्रह्म

अक्षर ब्रह्म अविनाशी ब्रह्म है; अध्याय 8 इसे परम सत्य कहता है और मृत्यु के समय इसके स्मरण की शिक्षा देता है।

गीता के 12 श्लोक जो अक्षर ब्रह्म पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 8.1
अर्जुन उवाचकिं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा जाता है यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस देहमें कैसे है हे मधूसूदन नियतात्मा वशीभूत अंतःकरण वाले मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं ॥
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भगवद् गीता 8.2
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा जाता है यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस देहमें कैसे है हे मधूसूदन नियतात्मा वशीभूत अन्तःकरणवाले मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं ॥
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भगवद् गीता 8.4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥
हिन्दी अर्थ
हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थको अधिभूत कहते हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अधिदैव हैं और इस देहमें अन्तर्यामीरूपसे मैं ही अधियज्ञ हूँ ॥
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