भगवद् गीता में सर्वव्यापकता
गीता सिखाती है कि कृष्ण अपने अव्यक्त रूप से सारे जगत में व्याप्त हैं, और सब प्राणी उनमें स्थित हैं।
गीता के 11 श्लोक जो सर्वव्यापकता पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
- 9.7अ. 9
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
हे कुन्तीनन्दन कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ ॥
- 9.10अ. 9
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है । हे कुन्तीनन्दन इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है ॥
- 9.11अ. 9
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी…
- 9.18अ. 9
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ ।
- 10.8अ. 10
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
मैं संसारमात्रका प्रभव मूलकारण हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही…
- 10.42अ. 10
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
- 11.40अ. 11
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्तेनमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
हे सर्व आपको आगेसे भी नमस्कार हो पीछेसे भी नमस्कार हो सब ओरसे ही नमस्कार हो हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है अतः सब…
- 13.14अ. 13
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
वे परमात्मा सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं ।