भगवद् गीता में दान
दान देने का कर्म है; गीता उस दान को सात्त्विक कहती है जो कर्तव्य मानकर, उचित समय और स्थान पर, सुपात्र को, बदले की आशा बिना दिया जाए।
गीता के 11 श्लोक जो दान पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वायोगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ॥
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
- 17.21अ. 17
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है ॥
- 17.24अ. 17
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
इसलिये वैदिक सिद्धान्तोंको माननेवाले पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ऊँ इस परमात्माके नामका उच्चारण करके ही…
- 17.25अ. 17
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
तत् नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है ऐसा मानकर मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा फलकी इच्छासे रहित होकर अनेक प्रकारकी यज्ञ और…
- 17.27अ. 17
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
यज्ञ, तप और दानरूप क्रियामें जो स्थिति निष्ठा है, वह भी सत् ऐसे कही जाती है और उस परमात्माके निमित्त किया जानेवाला कर्म भी सत् ऐसा ही कहा…
- 17.28अ. 17
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
हे पार्थ अश्रद्धासे किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा और भी जो,कुछ किया जाय, वह सब असत् ऐसा कहा जाता है ।
- 18.3अ. 18
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
श्रीभगवान् बोले कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं ।
- 18.5अ. 18
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको…
- 18.43अ. 18
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव ये सबकेसब क्षत्रियके…