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विषय · 11 श्लोक

भगवद् गीता में दान

दान देने का कर्म है; गीता उस दान को सात्त्विक कहती है जो कर्तव्य मानकर, उचित समय और स्थान पर, सुपात्र को, बदले की आशा बिना दिया जाए।

गीता के 11 श्लोक जो दान पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 8.28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैवदानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वायोगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
हिन्दी अर्थ
योगी इसको शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जोजो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥
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भगवद् गीता 17.7
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ॥
हिन्दी अर्थ
आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी तीन प्रकारकी रुचि होती है, तू उनके इस भेदको सुन ॥
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भगवद् गीता 17.20
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
हिन्दी अर्थ
दान देना कर्तव्य है ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है ॥
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