भगवद् गीता में ब्रह्म
ब्रह्म गीता में परम सत्य है: अविनाशी, सत् और असत् से परे, और जो कुछ है उस सबका आधार।
अपरिवर्तनीय का अपरिवर्तनीय। ब्रह्म गीता का अंतिम सत्य है — जो किसी प्रकट होने से पहले है।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥
- 7.29अ. 7
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
जरा वृद्धावस्था और मरण मृत्यु से मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण…
- 8.1अ. 8
अर्जुन उवाचकिं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा जाता है यहाँ अधियज्ञ…
- 8.3अ. 8
श्री भगवानुवाचअक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
श्रीभगवान् बोले परम अक्षर ब्रह्म है और जीवका अपना जो होनापन है, उसको अध्यात्म कहते हैं ।
- 13.13अ. 13
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।
जो ज्ञेय है, उसपरमात्मतत्त्व को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है ।
- 13.15अ. 13
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका…
- 13.31अ. 13
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलगअलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है, उस कालमें वह…
- 14.27अ. 14
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च ।
क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ ॥