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विषय · 10 श्लोक

भगवद् गीता में ब्रह्म

ब्रह्म गीता में परम सत्य है: अविनाशी, सत् और असत् से परे, और जो कुछ है उस सबका आधार।

अपरिवर्तनीय का अपरिवर्तनीय। ब्रह्म गीता का अंतिम सत्य है — जो किसी प्रकट होने से पहले है।

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भगवद् गीता 4.24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
हिन्दी अर्थ
जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है, ऐसे यज्ञको करनेवाले जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्मसमाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है ॥
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भगवद् गीता 5.6
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥
हिन्दी अर्थ
परन्तु हे महाबाहो कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥
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भगवद् गीता 5.19
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥
हिन्दी अर्थ
जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवितअवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं ॥
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