भगवद् गीता में Avyakta
भगवद् गीता के 10 श्लोक जो avyakta पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥
- 8.19अ. 8
All formed things return and rise again under nature’s compulsion.
हे पार्थ वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न होहोकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिक
- 8.20अ. 8
What is deepest in reality cannot be destroyed by any ending.
परन्तु उस अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट
- 8.21अ. 8
The highest arrival is beyond return.
उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा पर
- 9.4अ. 9
The supreme reality holds everything without being held by anything.
यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे
- 12.1अ. 12
Devotion can face the divine as form or as formless reality.
जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आपसगुण भगवान् की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उन
- 12.3अ. 12
The deepest devotion reaches what never changes.
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करत
- 12.5अ. 12
The subtlest path is hardest for a body-bound mind.
अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको अपने साधनमें कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठ