भगवद् गीता में Kshetra Kshetrajna
भगवद् गीता के 10 श्लोक जो kshetra kshetrajna पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः ॥
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा ॥
- 13.13अ. 13
The highest reality frees you precisely because it outgrows every label.
जो ज्ञेय है, उसपरमात्मतत्त्व को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है । वह ज्ञेयतत्त्व अन
- 13.21अ. 13
Action belongs to nature; experience belongs to the one who knows.
प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो । कार्य और करणके द्वारा
- 13.24अ. 13
Clear seeing frees you while life still continues.
इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलगअलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता
- 13.28अ. 13
Real seeing notices one imperishable presence in every changing form.
जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है ॥
- 13.31अ. 13
Many beings are one reality seen through different forms.
जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलगअलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है,
- 13.33अ. 13
What is everywhere cannot be stained by what changes.
जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देहमें लिप
- 15.9अ. 15
Experience passes through mind and senses; it does not define the true self.
यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है ॥