विषय · 13 श्लोक

भगवद् गीता में Jnana Yoga

भगवद् गीता के 13 श्लोक जो jnana yoga पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 3.3Speaker: Krishna
श्री भगवानुवाचलोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्
अर्थ · हिन्दी
श्रीभगवान् बोले हे निष्पाप अर्जुन इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है । उनमें ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है ॥
सार
There are two valid ways to live steadily: one through understanding, one through action. Different temperaments need different disciplines.
Different natures are steadied by different disciplines.
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भगवद् गीता 4.2Speaker: Krishna
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः
कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप
अर्थ · हिन्दी
हे परंतप इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना । परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया ॥
सार
This ancient yoga was passed down from teacher to student and known by wise rulers, but over time it faded from the world.
Even timeless wisdom disappears when no one keeps receiving it.
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भगवद् गीता 4.3Speaker: Krishna
एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्
अर्थ · हिन्दी
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है ॥
सार
Krishna says he is teaching Arjuna an ancient teaching because Arjuna is both devoted and close to him. This teaching is a rare and highest secret.
The deepest teaching opens only to devotion and trust.
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