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विषय · 11 श्लोक

भगवद् गीता में भगवान्

भगवान् का अर्थ है सब दिव्य गुणों से युक्त ईश्वर; गीता में यह कृष्ण के लिए आता है, जो सब प्राणियों के मूल हैं।

गीता के 11 श्लोक जो भगवान् पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 7.6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥
हिन्दी अर्थ
अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो । मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ ॥
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भगवद् गीता 7.7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
हिन्दी अर्थ
हे धनञ्जय मेरे बढ़कर इस जगत् का दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है । जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओतप्रोत है ॥
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भगवद् गीता 9.4
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
हिन्दी अर्थ
यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं मेरे इस ईश्वरसम्बन्धी योगसामर्थ्य को देख सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरणपोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है ॥
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