भगवद् गीता में भगवान्
भगवान् का अर्थ है सब दिव्य गुणों से युक्त ईश्वर; गीता में यह कृष्ण के लिए आता है, जो सब प्राणियों के मूल हैं।
गीता के 11 श्लोक जो भगवान् पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
- 9.6अ. 9
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं ऐसा तुम मान लो ॥
- 9.11अ. 9
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी…
- 10.4अ. 10
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश प्राणियोंके ये अनेक…
- 10.14अ. 10
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
हे केशव मेरेसे आप जो कुछ कह रहे हैं, यह सब मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन् आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं ॥
- 10.15अ. 10
स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
हे भूतभावन हे भूतेश हे देवदेव हे जगत्पते हे पुरुषोत्तम आप स्वयं ही अपनेआपसे अपनेआपको जानते हैं ॥
- 10.16अ. 10
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं ॥
- 10.17अ. 10
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
हे योगिन् हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और हे भगवन् किनकिन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात्…
- 13.14अ. 13
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
वे परमात्मा सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं ।