अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्
हिम्मत न हारना ही सफलता की जड़ है, यही सबसे बड़ा सुख है।
हनुमान, लंका में मन ही मन · वाल्मीकि रामायण 5.12
बड़े पर्दे पर देखा, अब वह पंक्ति पढ़िए जहाँ से वह दृश्य आया।
खबरों के मुताबिक "रामायण: पार्ट 1" बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड और अरण्यकाण्ड को, सीता हरण तक, दिखाती है। यहाँ उसके 11 जाने-माने दृश्यों को वाल्मीकि की संस्कृत रामायण और तुलसीदास के रामचरितमानस से मिलाया गया है, हर एक के साथ श्लोक या चौपाई का संदर्भ है। 6 दृश्य दोनों ग्रंथों में हैं, 4 सिर्फ़ तुलसीदास के यहाँ, और 1, शबरी के जूठे बेर, किसी में नहीं।
हर दृश्य के साथ तीन दीये हैं: फ़िल्म, वाल्मीकि और तुलसीदास। जलता दीया मतलब वह प्रसंग उस रूप में है। किसी दीये पर टैप करें और उस ग्रंथ की मूल पंक्ति सरल हिंदी अर्थ के साथ पढ़ें।
बालकाण्ड
पत्थर तुलसीदास के यहाँ है
क्या वाल्मीकि रामायण में अहल्या पत्थर बनी थी?
नहीं। वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड, सर्ग 48 और 49) में गौतम के श्राप से अहल्या आश्रम में हवा पर जीती है और राम के आने तक किसी प्राणी को दिखाई नहीं देती। फिर राम और लक्ष्मण उसके पाँव छूते हैं। पत्थर का शरीर, "उपल देह", तुलसीदास के रामचरितमानस (बालकाण्ड) में है, जहाँ राम के पाँव की धूल उसे मुक्त करती है।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। ट्रेलर में या फ़िल्म बनाने वालों की ओर से यह दृश्य अब तक सामने नहीं आया है।
वाल्मीकि. पत्थर नहीं। अहल्या आश्रम में अदृश्य रहकर हवा पर जीती है, और दोनों राजकुमार उसके पाँव छूते हैं।
ग्रंथ में इसकी जगह क्या है
वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसिहवा पर जीती, बिना अन्न के, तप करती, राख पर सोती, सब प्राणियों की आँखों से ओझल रहकर तुम इसी आश्रम में रहोगी।
राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदातब रघुकुल के दोनों राजकुमारों ने प्रसन्न होकर उसके पाँव छुए।
तुलसीदास. अहल्या पत्थर बनी इंतज़ार करती है, जब तक राम का पाँव उसे नहीं छूता।
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥गौतम की पत्नी श्राप के कारण पत्थर का शरीर लिए धीरज से पड़ी है। उसे आपके चरणकमलों की धूल चाहिए। रघुवीर, उस पर कृपा कीजिए।
बालकाण्ड
धनुष दोनों में टूटता है, सभा तुलसीदास जोड़ते हैं
क्या वाल्मीकि रामायण में सीता का स्वयंवर हुआ था?
राजाओं की सभा वाला स्वयंवर नहीं। वाल्मीकि (बालकाण्ड, सर्ग 66 और 67) में जनक बताते हैं कि बरसों में कई राजा आए और कोई शिव का धनुष उठा नहीं सका। फिर वे राम के लिए धनुष मँगवाते हैं, और राम हज़ारों लोगों के सामने उस पर डोरी चढ़ाकर उसे तोड़ देते हैं। दस हज़ार राजाओं के एक साथ हारने वाली सभा तुलसीदास के रामचरितमानस (बालकाण्ड) में है।
फ़िल्म. फ़िल्म में (ट्रेलर और फ़िल्म बनाने वालों के हिसाब से): ट्रेलर में राम शिव का धनुष तोड़ते दिखते हैं।
वाल्मीकि. राम धनुष तोड़ते हैं। राजा पहले, अलग-अलग समय पर आकर हार चुके थे।
न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वावे उसे पकड़ना तो दूर, उठा तक नहीं सके।
लीलया स धनुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुनेःमुनि के कहने पर उन्होंने खेल-खेल में धनुष को बीच से थाम लिया।
तुलसीदास. दस हज़ार राजा एक साथ हारते हैं, फिर भरी सभा में राम धनुष तोड़ते हैं।
भूप सहस दस एकहि बारा।लगे उठावन टरइ न टारा॥डगइ न संभु सरासनु कैसें।कामी बचन सती मनु जैसें॥दस हज़ार राजा एक साथ उठाने लगे, पर धनुष टस से मस नहीं हुआ। शिव का धनुष वैसे ही अडिग रहा जैसे किसी कामी की बातों पर सती का मन।
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥उसी पल राम ने धनुष बीच से तोड़ दिया, और एक भयानक कड़क से सारे लोक भर गए।
अयोध्याकाण्ड
दोनों में, सरस्वती तुलसीदास जोड़ते हैं
वाल्मीकि और तुलसीदास कैकेयी के दो वरों की कथा कैसे कहते हैं?
दोनों ग्रंथों में हैं। वाल्मीकि (अयोध्याकाण्ड, सर्ग 9 और 11) में मंथरा कैकेयी को वे दो वर याद दिलाती है जो दशरथ ने तब दिए थे जब कैकेयी घायल दशरथ को युद्ध से बचाकर लाई थीं। कैकेयी भरत का राजतिलक और राम के लिए चौदह बरस का वनवास माँगती हैं। तुलसीदास (अयोध्याकाण्ड, दोहा 12) जोड़ते हैं कि देवताओं ने सरस्वती को भेजकर मंथरा की बुद्धि फेरी।
फ़िल्म. फ़िल्म में (ट्रेलर और फ़िल्म बनाने वालों के हिसाब से): ट्रेलर में राम कैकेयी की इच्छा मानकर राजगद्दी छोड़ते दिखते हैं।
वाल्मीकि. कैकेयी खुद दोनों वर माँगती हैं: भरत को राज, राम को वन।
नव पञ्च च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः॥चीराजिनधरो धीरो रामो भवतु तापसःनौ और पाँच, यानी चौदह बरस, राम दण्डक वन में छाल और मृगचर्म पहनकर तपस्वी की तरह रहें।
तुलसीदास. वही दो वर, पर पहले सरस्वती मंथरा की बुद्धि फेरती हैं।
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि।अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि॥कैकेयी की मंथरा नाम की एक नासमझ दासी थी। सरस्वती उसे बदनामी की पिटारी बनाकर, उसकी बुद्धि फेरकर चली गईं।
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का।देहु एक बर भरतहि टीका॥मागउँ दूसर बर कर जोरी।पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥सुनिए प्राणप्रिय, मेरे मन की बात। एक वर से भरत को राजतिलक दीजिए। दूसरा वर हाथ जोड़कर माँगती हूँ, नाथ, मेरी इच्छा पूरी कीजिए।
रघुकुल रीति सदा चलि आई।प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥रघुकुल की यही रीत सदा से चली आई है: प्राण भले चले जाएँ, वचन नहीं जाता।
अयोध्याकाण्ड
तुलसीदास के यहाँ
क्या वाल्मीकि रामायण में केवट राम के पाँव धोता है?
नहीं। वाल्मीकि (अयोध्याकाण्ड, सर्ग 52) में निषादराज गुह गंगा किनारे एक मज़बूत नाव और माँझी मँगवाते हैं, और राम, सीता और लक्ष्मण पार उतरते हैं। पाँव धोए बिना नाव पर न चढ़ाने वाला और उतराई न लेने वाला केवट तुलसीदास के रामचरितमानस (अयोध्याकाण्ड, दोहा 100) में है।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। ट्रेलर में या फ़िल्म बनाने वालों की ओर से यह दृश्य अब तक सामने नहीं आया है।
वाल्मीकि. गुह के लोग नाव लाते हैं। पाँव धोने की बात नहीं है।
ग्रंथ में इसकी जगह क्या है
सुप्रतारां दृढां तीर्थे शीघ्रं नावमुपाहरघाट पर तुरंत एक मज़बूत नाव लाओ, जो आराम से पार ले जाए।
तुलसीदास. केवट पहले राम के पाँव धोता है और उतराई लेने से मना कर देता है।
मागी नाव न केवटु आना।कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥चरन कमल रज कहुँ सबु कहई।मानुष करनि मूरि कछु अहई॥राम ने नाव माँगी, पर केवट नाव नहीं लाया। बोला, मैं आपका भेद जानता हूँ। सब कहते हैं कि आपके पाँव की धूल कोई जड़ी है जो चीज़ों को इंसान बना देती है।
पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौंपहले आपके चरणकमल धोऊँगा, फिर नाव पर चढ़ाऊँगा। नाथ, मुझे उतराई नहीं चाहिए।
अयोध्याकाण्ड
दोनों में
क्या मूल रामायण में भरत राजगद्दी ठुकराते हैं?
हाँ, दोनों में। वाल्मीकि (अयोध्याकाण्ड, सर्ग 79) में भरत राजतिलक की सामग्री की परिक्रमा करके मंत्रियों से कहते हैं कि बड़े भाई राम ही राजा होंगे और वन में वे खुद रहेंगे। चित्रकूट में वे राम से खड़ाऊँ पर पाँव रखकर उन्हें दे देने को कहते हैं (सर्ग 112)। तुलसीदास यही इनकार विस्तार से कहते हैं (अयोध्याकाण्ड)।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। भरत का किरदार फ़िल्म में है, पर ट्रेलर में यह दृश्य अब तक नहीं दिखा।
वाल्मीकि. भरत अयोध्या में मना करते हैं, फिर चित्रकूट से राम की खड़ाऊँ लेकर लौटते हैं।
रामः पूर्वो हि नो भ्राता भविष्यति महीपतिः।अहं त्वरण्ये वत्स्यामि वर्षाणि नव पञ्च च॥हमारे बड़े भाई राम ही राजा होंगे। चौदह बरस वन में मैं रहूँगा।
अधिरोहार्यपादाभ्यां पादुके हेमभूषिते।एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः॥भैया, इन सोने से सजी खड़ाऊँ पर अपने पाँव रखिए। यही सारी प्रजा का योग-क्षेम सँभालेंगी।
तुलसीदास. वही इनकार, धीरे-धीरे कहा हुआ, और अंत में भरत के सिर पर खड़ाऊँ।
एकहिं आँक इहइ मन माहीं।प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥मन में एक ही बात पक्की है: सुबह होते ही प्रभु के पास चलूँगा।
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं।सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥प्रभु ने कृपा करके अपनी खड़ाऊँ दीं, और भरत ने उन्हें आदर से सिर पर रख लिया।
अरण्यकाण्ड
तुलसीदास के यहाँ
क्या रावण के हरण से पहले असली सीता अग्नि में चली गई थीं?
सिर्फ़ तुलसीदास के यहाँ। रामचरितमानस (अरण्यकाण्ड, दोहा 24) में राम सीता से कहते हैं कि राक्षसों के नाश तक वे अग्नि में रहें, और सीता अपनी जगह अपनी छवि छोड़ देती हैं। लक्ष्मण तक को यह भेद नहीं पता। वाल्मीकि में ऐसी कोई बात नहीं है। उनके अरण्यकाण्ड (सर्ग 49) में रावण खुद सीता को ले जाता है।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। ट्रेलर में या फ़िल्म बनाने वालों की ओर से यह दृश्य अब तक सामने नहीं आया है।
वाल्मीकि. ऐसी कोई बात नहीं। रावण खुद सीता को पकड़ता है (अरण्यकाण्ड, सर्ग 49)।
तुलसीदास. राम असली सीता को अग्नि में रखते हैं, कुटिया में उनकी छवि रहती है।
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा।जौ लगि करौं निसाचर नासा॥जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो।
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता।तैसइ सील रूप सुबिनीता॥सीता ने वहाँ अपनी छवि छोड़ दी, जिसका स्वभाव, रूप और विनय बिलकुल उन्हीं जैसा था।
अरण्यकाण्ड
दोनों में, अलग ढंग से
वाल्मीकि और तुलसीदास सोने के हिरण की कथा कैसे कहते हैं?
दोनों में है। वाल्मीकि (अरण्यकाण्ड, सर्ग 42 से 44) में मारीच रत्नों से सजे हिरण का रूप लेता है। लक्ष्मण चेताते हैं कि यह मारीच है, सीता उसे माँगती हैं, और राम उसके पीछे जाते हैं। तुलसीदास (रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा 27) में राम सारा कारण जानते हैं और देवताओं का काम करने खुशी से उठते हैं।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। ट्रेलर में या फ़िल्म बनाने वालों की ओर से यह दृश्य अब तक सामने नहीं आया है।
वाल्मीकि. सीता को हिरण चाहिए, लक्ष्मण कहते हैं यह मारीच है।
आर्यपुत्राभिरामोऽसौ मृगो हरति मे मनःआर्यपुत्र, यह सुंदर हिरण मेरा मन मोह रहा है।
तमेवैनमहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम्मुझे लगता है यह हिरण वही राक्षस मारीच है।
तुलसीदास. राम जानते हैं कि हिरण क्या है, फिर भी जाते हैं।
तेहि बननिकट दसानन गयऊ।तब मारीच कपटमृग भयऊ॥अति बिचित्र कछु बरनि न जाई।कनक देह मनि रचित बनाई॥रावण जब उस वन के पास पहुँचा, तब मारीच कपट का हिरण बन गया। वह इतना अनोखा था कि बताया न जाए, सोने का शरीर, मणियों से जड़ा।
तब रघुपति जानत सब कारन।उठे हरषि सुर काजु सँवारन॥रघुपति सारा कारण जानते थे। वे देवताओं का काम सँवारने के लिए प्रसन्न होकर उठे।
अरण्यकाण्ड
दोनों में, अलग सुर में
लक्ष्मण के जाने से पहले सीता ने उनसे क्या कहा?
दोनों ग्रंथों में है। वाल्मीकि (अरण्यकाण्ड, सर्ग 45) में सीता झूठी पुकार सुनती हैं। लक्ष्मण उन्हें छोड़कर जाने से मना करते हैं, तो सीता उन पर लंबे-लंबे आरोप लगाती हैं, और लक्ष्मण उन्हें वन देवताओं को सौंपकर चले जाते हैं। तुलसीदास (अरण्यकाण्ड, दोहा 28) इसे एक पंक्ति में कहते हैं: सीता ने मर्म को चुभने वाले वचन कहे।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। ट्रेलर में या फ़िल्म बनाने वालों की ओर से यह दृश्य अब तक सामने नहीं आया है।
वाल्मीकि. सीता लंबी और कड़वी बातें कहती हैं, लक्ष्मण आशीर्वाद देकर जाते हैं।
रामं बिना क्षणमपि नैव जीवामि भूतलेराम के बिना मैं इस धरती पर एक पल भी नहीं जिऊँगी।
रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताःइस वन के सारे देवता आपकी रक्षा करें।
तुलसीदास. उनके वचनों के लिए एक पंक्ति, लक्ष्मण के जाने के लिए एक।
मरम बचन जब सीता बोला।हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥बन दिसि देव सौंपि सब काहू।चले जहाँ रावन ससि राहू॥सीता ने जब मन को चुभने वाली बात कही, तो हरि की प्रेरणा से लक्ष्मण का मन डगमगा गया। वे सीता को वन, दिशाओं और देवताओं के भरोसे छोड़कर राम की ओर चल पड़े। तुलसी कहते हैं, राम रावण के लिए वैसे ही हैं जैसे चाँद के लिए राहु।
अरण्यकाण्ड
तुलसीदास ज़िक्र भर करते हैं
क्या लक्ष्मण रेखा मूल रामायण में है?
वाल्मीकि रामायण में कोई रेखा नहीं है। अरण्यकाण्ड (सर्ग 45) में लक्ष्मण सीता को आशीर्वाद देकर जाते हैं: इस वन के सारे देवता आपकी रक्षा करें। तुलसीदास भी इस दृश्य में रेखा नहीं खिंचवाते (अरण्यकाण्ड, दोहा 28)। उनके यहाँ रेखा का ज़िक्र बाद में लंकाकाण्ड में आता है, जहाँ मंदोदरी रावण को ताना देती हैं कि वह लक्ष्मण की खींची छोटी-सी रेखा भी नहीं लाँघ पाया।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। ट्रेलर में या फ़िल्म बनाने वालों की ओर से यह दृश्य अब तक सामने नहीं आया है।
वाल्मीकि. कोई रेखा नहीं। लक्ष्मण आशीर्वाद देकर जाते हैं।
ग्रंथ में इसकी जगह क्या है
रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताःइस वन के सारे देवता आपकी रक्षा करें।
तुलसीदास. दृश्य में रेखा नहीं। मंदोदरी बाद में लंकाकाण्ड में इसका ज़िक्र करती हैं।
ग्रंथ में इसकी जगह क्या है
मरम बचन जब सीता बोला।हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥बन दिसि देव सौंपि सब काहू।चले जहाँ रावन ससि राहू॥सीता ने जब मन को चुभने वाली बात कही, तो हरि की प्रेरणा से लक्ष्मण का मन डगमगा गया। वे सीता को वन, दिशाओं और देवताओं के भरोसे छोड़कर राम की ओर चल पड़े। तुलसी कहते हैं, राम रावण के लिए वैसे ही हैं जैसे चाँद के लिए राहु।
रामानुज लघु रेख खचाई।सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥राम के छोटे भाई ने एक छोटी-सी रेखा खींची थी, आप उसे भी नहीं लाँघ पाए। क्या यही आपकी बहादुरी है?
अरण्यकाण्ड
दोनों में
रामायण में जटायु रावण से क्या कहते हैं?
दोनों ग्रंथों में यह लड़ाई है। वाल्मीकि (अरण्यकाण्ड, सर्ग 50 और 51) में बूढ़े गिद्धराज रावण से कहते हैं कि मैं बूढ़ा हूँ और तुम जवान और हथियारबंद, फिर भी सीता को नहीं ले जाने दूँगा, और वे लड़ते हैं। राम उन्हें मरणासन्न पाते हैं और अपने सगे की तरह उनका दाह करते हैं (सर्ग 68)। तुलसीदास इसे अरण्यकाण्ड, दोहा 29 से 32 में कहते हैं।
फ़िल्म. फ़िल्म में (ट्रेलर और फ़िल्म बनाने वालों के हिसाब से): जटायु फ़िल्म में हैं, 2024 की खबरों के मुताबिक उन्हें एक कैमियो में आवाज़ दी गई है। लड़ाई कैसे दिखेगी, यह अभी पता नहीं।
वाल्मीकि. जटायु रावण के सामने डटते हैं, राम सगे की तरह उनका दाह करते हैं।
वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी।न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि॥मैं बूढ़ा हूँ और तुम जवान, धनुष, रथ, कवच और बाणों के साथ। फिर भी वैदेही को लेकर तुम मेरे सामने से सही-सलामत नहीं जा पाओगे।
एवमुक्त्वा चितां दीप्तामारोप्य पतगेश्वरम्।ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दुःखितः॥यह कहकर धर्मात्मा राम ने पक्षिराज को जलती चिता पर रखा और दुखी मन से उनका दाह किया, जैसे अपने ही किसी सगे का करते।
तुलसीदास. जटायु रावण को चेताते हैं, लड़ते हैं, और राम उनकी अंतिम क्रिया करते हैं।
सुनत गीध क्रोधातुर धावा।कह सुनु रावन मोर सिखावा॥तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू।नाहिं त अस होइहि बहुबाहू॥यह सुनते ही गिद्धराज गुस्से में झपटे। बोले, रावण, मेरी सीख सुनो। जानकी को छोड़कर सही-सलामत घर जाओ, नहीं तो हे बहुत भुजाओं वाले, अंजाम यह होगा।
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥अटूट भक्ति का वर माँगकर गिद्धराज हरि के धाम चले गए। राम ने अपने हाथों से विधि के साथ उनकी अंतिम क्रिया की।
अरण्यकाण्ड
बाद की कथा
क्या शबरी ने बेर चखकर राम को दिए थे?
न वाल्मीकि ऐसा कहते हैं, न तुलसीदास। वाल्मीकि (अरण्यकाण्ड, सर्ग 74) में शबरी ने राम के लिए पम्पा के किनारे से वन के फल-मूल जुटाए हैं। रामचरितमानस (अरण्यकाण्ड, दोहा 34) में वे कंद, मूल और फल लाती हैं, और राम उन्हें प्रेम से खाते हुए बार-बार सराहते हैं। चखे हुए जूठे बेर बाद की भक्ति-कथाओं से आए हैं।
फ़िल्म. अभी पता नहीं। खबरों के मुताबिक पहला भाग सीता हरण के आसपास खत्म होता है, इसलिए यह दृश्य दूसरे भाग में हो सकता है।
वाल्मीकि. राम के लिए जुटाए वन के फल-मूल। चखने की बात नहीं।
ग्रंथ में इसकी जगह क्या है
मया तु संचितं वन्यं विविधं पुरुषर्षभ॥तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम्हे पुरुषश्रेष्ठ, आपके लिए मैंने पम्पा के किनारे से तरह-तरह के वन के फल-मूल जुटाए हैं।
अर्चितोऽहं त्वया भद्रे गच्छ कामं यथासुखम्भद्रे, तुमने मेरा सत्कार किया है। अब जहाँ चाहो, सुख से जाओ।
तुलसीदास. कंद-मूल और फल, प्रेम से खाए गए। चखने की बात नहीं।
ग्रंथ में इसकी जगह क्या है
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥वे बहुत रसीले कंद, मूल और फल लाकर राम को दिए। प्रभु ने प्रेम से खाए और बार-बार उनकी सराहना की।
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।मानउँ एक भगति कर नाता॥रघुपति बोले, सुनो भामिनी, मैं बस भक्ति का रिश्ता मानता हूँ।
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अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्
हिम्मत न हारना ही सफलता की जड़ है, यही सबसे बड़ा सुख है।
हनुमान, लंका में मन ही मन · वाल्मीकि रामायण 5.12
आश्वसिहि नरश्रेष्ठ प्राणिनः कस्य नापदः।संस्पृशन्त्यग्निवद् राजन् क्षणेन व्यपयान्ति च॥
विपत्ति सब पर आती है। वह आग की तरह छूती है और पल भर में चली जाती है।
लक्ष्मण, राम से · वाल्मीकि रामायण 3.66
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
जहाँ सुमति है वहाँ हर तरह की संपत्ति है। जहाँ कुमति है वहाँ अंत में विपत्ति है।
विभीषण, रावण से · रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड
कल्याणी वत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति माम्।एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि॥
जो जीता रहता है, उसे सौ बरस बाद भी आनंद मिल ही जाता है।
भरत, हनुमान से · वाल्मीकि रामायण 6.126
सात सुबह, हर सुबह एक पंक्ति, आपकी बात के लिए। पहला हफ़्ता मुफ़्त।
पहला हफ़्ता मुफ़्त शुरू करेंवाल्मीकि की पंक्तियाँ संस्कृत वाल्मीकि रामायण से हैं। संदर्भ में काण्ड और सर्ग दिए हैं, जो गीता प्रेस संस्करण से मेल खाते हैं। अलग-अलग संस्करणों में श्लोक संख्या बदलती है, इसलिए हर पंक्ति के साथ Wisdom की पंक्ति आईडी भी है। तुलसीदास की पंक्तियाँ अवधी रामचरितमानस से हैं। जहाँ दोहा संख्या दी है, वह गीता प्रेस, गोरखपुर संस्करण के हिसाब से है। जहाँ संख्या अभी पक्की नहीं कर पाए, वहाँ सिर्फ़ काण्ड का नाम है।
हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ Wisdom ने खुद लिखे हैं। अनुवाद Wisdom का, संपादन अंकुर शुक्ला। टिप्पणी AI से तैयार, इंसान द्वारा जाँची गई।
फ़िल्म के बारे में जो भी लिखा है, वह सिर्फ़ उसके ट्रेलर और छपी खबरों पर आधारित है। हमने फ़िल्म नहीं देखी है।