भगवद् गीता में ईश्वर की अभिव्यक्ति
गीता सिखाती है कि कृष्ण सब प्राणियों के मूल हैं, और जो कुछ भी ऐश्वर्य या शक्ति से युक्त है, वह उनके तेज के अंश से है।
गीता के 11 श्लोक जो ईश्वर की अभिव्यक्ति पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
- 10.4अ. 10
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश प्राणियोंके ये अनेक…
- 10.31अ. 10
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
पवित्र करनेवालोंमें वायु और शास्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ । जलजन्तुओंमें मगर मैं हूँ । बहनेवाले स्त्रोतोंमें गङ्गाजी मैं हूँ ॥
- 10.35अ. 10
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
गायी जानेवाली श्रुतियोंमें बृहत्साम और वैदिक छन्दोंमें गायत्री छन्द मैं हूँ । बारह महीनोंमें मार्गशीर्ष और छः ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ ॥
- 10.41अ. 10
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
जोजो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उसउसको तुम मेरे ही तेजयोग के अंशसे उत्पन्न हुई समझो ॥
- 10.42अ. 10
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
- 13.17अ. 13
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं ।
- 13.27अ. 13
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो ॥
- 15.12अ. 15
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान ॥