वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैवदानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वायोगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
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योगी इसको शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जोजो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥
English
Knowing the two paths, the yogi goes beyond all the merits declared in the Vedas, sacrifices, austerities, and gifts, and reaches the primal supreme abode.